सदियों से चली आ रही परंपरा में यहां होली की धधकती आग के बीच से निकलता है पंडा

मथुरा
होली के खुमार में डूबी कान्हा नगरी में एक गांव ऐसा भी है जहां सदियों से धधकती होली के बीच से पंडे के निकलने की परंपरा आज भी निभाती जा रही है। मान्यता है कि श्रद्धा के इस खेल में पंडे को होली की आंच बर्फ के माफिक ठंडी लगती है। इस बार फालैन गांव की धधकती होली से मोनू पंडा निकलेगा। वह वसंत से ही गांव कें प्रहलाद मन्दिर में रहकर आराधना कर रहा है और पिछले एक पखवारे से उसने अन्न का परित्याग कर दिया है। वह केवल दूध और फल ही ले रहा है।
गोपाल मन्दिर के महन्त बालकदास ने बताया कि मोनू पिछले दो साल से धधकती होली से निकल रहा है तथा तीसरी बार होली से निकलने के लिए वह प्रहलाद मन्दिर में जप तप कर रहा है। यह विडंबना ही है कि फालैन गांव में इस अवसर पर श्रद्धा का सैलाब उमड़ता है मगर जिला प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करने के लिये कोई इंतजाम नहीं किये जाते और चंद पुलिसकर्मियों के सहारे मेला सम्पन्न होता है। ग्रामीणों का आरोप है कि इतना बड़ा मेला लगने के बावजूद गांव विकास की मुख्य धारा से कोसों दूर है। गांव में आने जाने के लिए बस की कोई व्यवस्था नहीं है। बिजली कब आएगी और कब जाएगी इसका भी कुछ पता नही है।
उनका यह भी कहना था कि गांव में लड़कियों की शिक्षा के लिये केवल आठवीं तक का ही विद्यालय है, इसलिए अधिकांश लड़कियां इससे आगे नही पढ पाती हैं। इस सबके बावजूद होली का मेला दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है। यहां पर होली जलने का महूर्त पंडा बताता है वह होली जलने के 12 घंटे पहले हवन करना शुरू कर देता है तथा पास में ही जलते हुए दीपक पर हाथ रखकर होली जलाने के बारे में बताता है। उसे जब दीपक की लौ ठंडी लगने लगती है तो वह होली में आग लगाने के लिए कहता है तथा खुद पास के प्रहलाद कुंड में स्नान करता है। इस बीच उसकी बहन कुंड से जल लेकर होली तक आने के मार्ग पर करूए से पानी डालती है तथा पंडा पलक झपकते ही धधकती होली से निकल जाता है।

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