मृत्यु के समय डा. परमार के बैंक खाते में थे 563 रुपये 30 पैसे…”हम रहें न रहें, हिमाचल रहे…………….!”
डॉक्टरपरमार जयंती
ये शब्द हिमाचल निर्माता डा. यशवंत सिंह परमार के थे। सन 1956 में डॉक्टर परमार ने जब प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू और गृह मंत्री पं. गोविंद वल्लभ पंत से हिमाचल प्रदेश का वजूद भारत के नक्शे पर बनाए रखने के लिए प्रार्थना की थी तो उन्होंने यह उदगार व्यक्त किये थे।
इसके बाद शुरू हुआ था हिमाचल का अनिश्चित सा सफर, साथ-साथ चला डा. परमार का संघर्षमय राजनीतिक जीवन जिसमें पराजय की कड़वाहट भी थी और विजय की मिठास भी।
डा. परमार ने हिमाचल को पूर्ण राज्यत्व का दर्जा दिलाने के लिए जबरदस्त संघर्ष किया और 25 जनवरी 1971 को इसे हासिल किया।
डा. परमार हिमाचल का इतिहास बनाने-बनाते स्वंय इतिहास बन गए। उन्होंने हिमाचल के जन-जीवन पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है और हिमाचल के लिए एक बड़ी विरासत, विकास और समृद्धि का सृजन कर गए।
लेकिन हिमाचलियों के लिए इतनी बड़ी विरासत छोड़ने वाले डा. परमार के बैंक खाते में केवल 563 रुपये 30 पैसे थे जब, उन्होंने 2 मई 1981 को अंतिम विदाई ली। कहां मिलेगी ऐसी आत्म त्याग की मिसाल।
डॉक्टर परमार एक संत का जीवन जिये और अपना सम्पूर्ण जीवन हिमाचल के लिए समर्पित कर दिया।
हिमाचल के इस महान सपूत को हम जयंती पर शत -शत नमन करते हैं।
-आनंद राज

