“मौत भी न तोड़ सकी रिश्ता: बर्फीले तूफान में चार दिन पहरा देता रहा पालतू कुत्ता”

​चंबा की भरमाणी माता मंदिर की पहाड़ियों से आई यह तस्वीर पत्थर का कलेजा रखने वालों को भी रुला देने वाली है। जहाँ हाड़ कंपा देने वाली ठंड में इंसान का खून जम जाए, वहाँ वफ़ादारी का एक ऐसा ‘देवता’ बैठा था, जिसने मौत को भी अपनी निष्ठा से हैरान कर दिया।
​चार दिन… चार लंबी बर्फीली रातें… और एक मूक पहरेदार
​19 साल के विकसित और 13 साल के पीयूष बर्फीले तूफान की बेरहमी का शिकार होकर अपनी जान गंवा बैठे। लेकिन उनका पालतू बफादार चार दिनों तक, बिना कुछ खाए-पिए, शून्य से नीचे के तापमान में अपने मालिकों के बेजान शरीरों के पास पहरा देता रहा। आस-पास मौत का सन्नाटा था और आसमान से गिरती बर्फ की सफेद चादर, लेकिन उस नन्हे जीव के सीने में अपने मालिकों के प्रति प्रेम की आग जल रही थी।

​वो चाहता तो अपनी जान बचाकर भाग सकता था, लेकिन उसने वफ़ादारी चुनी। जिसे दुनिया ‘शव’ समझ रही थी, वो उसके लिए उसका पूरा संसार था। उसने कड़कड़ाती ठंड झेली, तूफानों का सीना तानकर सामना किया और अंधेरी रातों में जंगली जानवरों से अपने मालिकों की देह को खरोंच तक नहीं आने दी। शायद वो अपनी खामोश जुबान से यही कह रहा होगा— “उठो न मालिक… देखो कितनी ठंड है…”

​जब रेस्क्यू टीम वहां पहुँची, तो उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि अपनों को खो देने का असहनीय दर्द था। उसकी आंखों से गिरते आंसू बता रहे थे कि प्रेम की कोई भाषा नहीं होती, सिर्फ एहसास होते हैं। जब इंसानी हाथों ने उसे सहलाया, तो वो पत्थर सा जमा… फूट-फूट कर रो पड़ा। उसकी वो सिसकी आज भी भरमौर की वादियों में गूँज रही होगी।

​इंसान अक्सर रिश्तों में वफ़ादारी की कसमें खाता है, लेकिन इस बेजुबान ने बिना एक शब्द बोले वफ़ादारी की वो परिभाषा लिख दी जो सदियों तक याद रखी जाएगी। उसने साबित कर दिया कि “कुत्ता” शब्द कोई संबोधन नहीं, बल्कि वफ़ादारी का सबसे ऊँचा शिखर है।

​भरमौर की बर्फ में दबे वे मासूम तो चले गए, लेकिन उनके पीछे खड़ा यह वफादार दोस्त दुनिया को एक बड़ा सबक दे गया। इस महान ‘वफ़ादार प्रहरी’ को कोटि-कोटि नमन।

मूक रहकर भी वफ़ा की अनोखी दास्ताँ लिख गया,
वो बेजुबान अपनी वफ़ादारी से हिमालय सा ऊँचा दिख गया।

ॐ शांति! उन मासूमों की आत्मा को शांति मिले और इस वफ़ादार साथी के जज्बे को सलाम।

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